Subscribe

RSS Feed (xml)



Powered By

Powered by Blogger

Best Offers

Share with me

Showing posts with label धन से मनुष्य का पाप उभर जाता है. Show all posts
Showing posts with label धन से मनुष्य का पाप उभर जाता है. Show all posts

Saturday, April 03, 2010

धन से मनुष्य का पाप उभर जाता है

धन से मनुष्य का पाप उभर जाता है,
निर्धन जीवन यदि हुआ,बिखर जाता है .
कहते है जिसको सुयास - कीर्ति, सो क्या है ?
कानो की यदि गुदगुदी नही, तो क्या है ?
यश-अयश-चिन्तना भूल स्थान पकरो रे !
यस नही, मात्र जीवन के लिए लरो रे !
 --------------------------------------------
बलि योद्धा , बऱा बिकराल था वह !
हरे ! कैसा भयानक काल था वह ?
मुषल विष में बुझे थे , बाण क्या थे !
शिला निर्मोघ ही थी , प्राण क्या थे !

Hotels in India

Best Offer